Reported by : Nidhi Sachan 
(Master of Mass Communication, 1st Year)
 
                                                                फ़िल्मों के बदलते मायने
पर्दे पर अपनी छवि से हटकर विपरीत चरित्रों को प्रदर्शित करना ,हमारी फ़िल्मों और कलाकारों का व्यक्तित्व रहा है। अनेक तरह की परम्पराओं और कुरीतियों को पीछे करने का शायद यह सबसे सफल प्रयास रहा होगा। अपनी सोच को परदे और कलाकारों के जरिये समाज मेंपहुंचाना फ़िल्मों का एक कामयाब कारनामा रहा है। लेकिन बदलते दौर ने फ़िल्मों के मायने और उनसे मिलने वाली सकारात्मक सोच को ही बदल कर रख दिया है।


जहाँ परदे पर "मांझी" और "मसान" जैसी फिल्में समाज को एक सकारात्मक सोच देने की बेजोड़ कोशिश करते हुये नज़र आते है। वहीँ "क्या कूल है हम- 3" और "मस्तीजाद" जैसी फूहड़ फ़िल्मों की होड़ लगी हुयी है।



आज देश मे हम "सेक्स एजुकेशन" को हर व्यक्ति और बच्चों को समझाना चाहते है। वहीँ ऐसी फिल्में "सेक्स" शब्द के मायने ही बदल रही हैंसिर्फ़ कॉमेडी के नाम पर हमारे समाज के साथ भद्दा मज़ाक किया जा रहा है।
 U/A, U, A जैसी कैटेगरी के ज़रिए ऐसी फ़िल्मों को पर्दे में जगह मिलती है। जो "अडल्ट" का टैग देकर पर्दे से तो इन फ़िल्मों से बच्चो को थोड़ी देर के रोक सकते है। लेकिन क्या वाकई हम उन्हे टीवी, इंटरनेट से रोक पाएंगे? 
जहाँ टेलेविजन के जरिये "एकता कपूर" के "सास-बहू" के सीरियल दर्शकों को लुभाने की कोशिश में जुटे रहते है, वहीं एकता कपूर द्वारा निर्देशित "क्या कूल है हम-3" जैसी फ़िल्मों को पर्दे पर लाकर भारतीय संस्कृति की धज्जियां उड़ाते हु नज़र आत है। डबल मीनिंग शब्दो का सहारा, अश्लीलता को बढ़ावा देते हु नज़र आते है। सेंसर बोर्ड द्वारा "GANDU, CHATRAK, KAM SUTRA-A TALE OF LOVE, PAANCH, THE PINK MIRROR, MASTIZADE, KYA KOOL HAI HUM-3" जैसी फिल्मों मे सेक्स सीन्स को हटाने के बाद भी "क्या कूल है हम-3" जैसी फिल्में अश्लीलता को बाँटने में कामयाब रही है
आज के समय में जहाँ विज्ञान का बढ़ता स्वरूप सामने आ रहा है। वहीं भारतीय संस्कॄति पर बात करने वाले लोग सेक्स कॉमेडी के नाम पर कुछ भी परोस रहे है। वहीं टीवी के रेयल्टी शो  के नाम पर अभद्र कलाकारों को पहचान देने का अनूठा प्रयास किया जाता है। जो शायद मनोरंजन के नाम पर हमारी भारतीय संस्कॄति पर सवालिया निशान खड़े करते जा रहे हैं?

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